राजधानी चौपाल, नई दिल्ली। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI Future) और सोशल मीडिया अब बच्चों की जिंदगी का सामान्य हिस्सा बन चुके हैं। यूट्यूब, इंस्टाग्राम, चैटजीपीटी और अन्य जनरेटिव AI प्लेटफॉर्म बच्चों के सीखने, मनोरंजन और संवाद के तरीके को तेजी से बदल रहे हैं। लेकिन इसी बदलाव ने दुनिया भर की सरकारों, शिक्षाविदों और मनोवैज्ञानिकों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है-क्या कम उम्र के बच्चों को AI और एल्गोरिदम आधारित डिजिटल दुनिया से दूर रखा जाना चाहिए, या उन्हें भविष्य की तैयारी के लिए इन तकनीकों से जोड़ना जरूरी है?
आज दुनिया के कई विकसित देश बच्चों की डिजिटल पहुंच सीमित करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, जबकि भारत इसके उलट AI को शिक्षा और कौशल विकास का अहम हिस्सा बनाने में जुटा हुआ है। यही विरोधाभास वैश्विक बहस का केंद्र बन गया है।
AI Future : दुनिया में बढ़ रही सख्ती
बच्चों की मानसिक सेहत, ध्यान क्षमता और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच कई देशों ने डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आयु-आधारित प्रतिबंधों को सख्त करना शुरू कर दिया है।
नॉर्वे ने सोशल मीडिया उपयोग की न्यूनतम आयु 16 वर्ष करने का प्रस्ताव रखा है। सरकार तकनीकी कंपनियों को आयु सत्यापन की कानूनी जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी कर रही है ताकि बच्चे झूठी जानकारी देकर प्लेटफॉर्म तक आसानी से न पहुंच सकें।
ऑस्ट्रेलिया ने भी 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया और एल्गोरिदम संचालित प्लेटफॉर्म पर कड़े प्रतिबंध लागू किए हैं। सरकार का मानना है कि लगातार स्क्रीन एक्सपोजर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक व्यवहार और एकाग्रता क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
यूरोपीय संघ (EU) ने डिजिटल सर्विसेज एक्ट (DSA) के तहत बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। नए नियमों के अनुसार कंपनियां बच्चों की प्रोफाइलिंग नहीं कर सकतीं और उन्हें लक्षित विज्ञापन भी नहीं दिखा सकतीं। इसके अलावा उम्र सत्यापन को प्रभावी बनाने के लिए विशेष डिजिटल समाधान विकसित किए जा रहे हैं।
फ्रांस और डेनमार्क जैसे देश स्कूल परिसरों को मोबाइल-मुक्त बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। उद्देश्य स्पष्ट है—बच्चों का ध्यान स्क्रीन से हटाकर वास्तविक सीखने और सामाजिक गतिविधियों की ओर लौटाना।
AI Future : भारत का रास्ता अलग
दूसरी ओर भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल उपभोक्ता बाजारों में शामिल है। देश में इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच अभूतपूर्व गति से बढ़ी है। करोड़ों बच्चे और युवा अब डिजिटल दुनिया का हिस्सा बन चुके हैं।
इंटरनेट और मोबाइल उपयोग से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि भारत में एक अरब से अधिक मोबाइल कनेक्शन और लगभग उतने ही इंटरनेट उपयोगकर्ता मौजूद हैं। अधिकांश लोग इंटरनेट तक पहुंचने के लिए स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में युवाओं के बीच स्मार्टफोन पहुंच 95 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है।
भारत दुनिया में सबसे अधिक मोबाइल डेटा उपयोग करने वाले देशों में शामिल है। औसतन एक भारतीय हर महीने दर्जनों गीगाबाइट डेटा खर्च करता है, जिससे डिजिटल प्लेटफॉर्म बच्चों और युवाओं की दिनचर्या का हिस्सा बन गए हैं।
बच्चों को AI सिखाने पर जोर
जहां कई देश बच्चों की डिजिटल पहुंच सीमित कर रहे हैं, वहीं भारत AI को शिक्षा का नया आधार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। केंद्र सरकार के अटल इनोवेशन मिशन और इंडियाAI मिशन के तहत युवाओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जोड़ने के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। YUVAi ग्लोबल यूथ चैलेंज जैसे मंच छात्रों को AI आधारित नवाचार और तकनीकी समाधान विकसित करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
शिक्षा मंत्रालय की ‘AI फॉर स्कूल्स’ पहल के तहत हजारों स्कूलों में AI आधारित पाठ्यक्रम शुरू किए जा चुके हैं। अब इस पहल को और अधिक कक्षाओं तक विस्तार देने की तैयारी है। सरकार का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI साक्षरता उतनी ही महत्वपूर्ण होगी जितनी आज कंप्यूटर शिक्षा है।
चिंता का सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में डेटा सुरक्षा और डिजिटल गोपनीयता को लेकर नियम विकसित हो रहे हैं, लेकिन बच्चों पर जनरेटिव AI और सोशल मीडिया के मनोवैज्ञानिक प्रभावों को लेकर अभी व्यापक नीति का अभाव है।
सबसे बड़ी चुनौती उम्र सत्यापन की है। अधिकांश डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कोई भी बच्चा गलत जन्मतिथि दर्ज कर आसानी से अकाउंट बना सकता है। ऐसे में कानूनी प्रतिबंधों को प्रभावी ढंग से लागू करना मुश्किल हो जाता है।
डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) नियमों के तहत 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों का डेटा प्रोसेस करने से पहले अभिभावकों की सत्यापित सहमति आवश्यक होगी। साथ ही बच्चों को लक्षित विज्ञापन दिखाने पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है। हालांकि इन नियमों का वास्तविक प्रभाव उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
बहस का असली सवाल
AI का उपयोग भारत में तेजी से बढ़ रहा है और युवा वर्ग इसमें सबसे आगे है। शिक्षा, कंटेंट निर्माण, कोडिंग, शोध और दैनिक कार्यों में AI टूल्स का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में सवाल यह नहीं रह गया कि बच्चे AI का उपयोग करेंगे या नहीं, बल्कि यह है कि वे इसका उपयोग किस तरह करेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध समाधान नहीं है। जरूरत सुरक्षित, नियंत्रित और जिम्मेदार उपयोग की है। बच्चों को AI से पूरी तरह दूर रखने के बजाय उन्हें डिजिटल साक्षरता, तथ्य जांच, गोपनीयता सुरक्षा और जिम्मेदार तकनीकी व्यवहार की शिक्षा देना अधिक प्रभावी रणनीति हो सकती है।
आज दुनिया दो अलग रास्तों पर खड़ी दिखाई देती है। एक ओर वे देश हैं जो बच्चों को एल्गोरिदम और स्क्रीन के प्रभाव से बचाने के लिए सख्त नियम बना रहे हैं। दूसरी ओर भारत है, जो AI को भविष्य की अर्थव्यवस्था और रोजगार का आधार मानते हुए नई पीढ़ी को इसके लिए तैयार कर रहा है।
आने वाले वर्षों में यह तय करेगा कि तकनीक बच्चों के विकास की सहयोगी बनती है या चुनौती। फिलहाल बहस जारी है और इसका जवाब केवल तकनीक नहीं, बल्कि समाज, परिवार और शिक्षा व्यवस्था को मिलकर खोजना होगा।