राजधानी चौपाल, हरियाणा। सनातन धर्म में चातुर्मास को आध्यात्मिक साधना और धार्मिक अनुशासन का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है। वर्ष 2026 में चातुर्मास की शुरुआत 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी से होगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं।
इसके बाद लगभग 120 दिनों तक विवाह सहित कई शुभ और मांगलिक कार्यों को स्थगित रखा जाता है। चातुर्मास का समापन 20 नवंबर 2026 को देवउठनी एकादशी के दिन होगा, जब भगवान विष्णु के जागरण की मान्यता है और शुभ कार्यों का क्रम दोबारा शुरू हो जाता है।
देवशयनी एकादशी से शुरू होती है धार्मिक साधना की विशेष अवधि
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी तक का समय चातुर्मास कहलाता है। यह अवधि सांसारिक उत्सवों की अपेक्षा आध्यात्मिक जीवन को समर्पित मानी जाती है। इस दौरान श्रद्धालु भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना, व्रत, जप, तप, दान और सेवा कार्यों के माध्यम से धार्मिक अनुशासन का पालन करते हैं।
चार महीने तक क्यों नहीं होते विवाह और अन्य शुभ कार्य?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने के दौरान नए मांगलिक कार्यों की शुरुआत शुभ नहीं मानी जाती। इसी कारण 25 जुलाई से 20 नवंबर तक विवाह समारोह आयोजित नहीं किए जाते। इसके अलावा गृह प्रवेश, मुंडन संस्कार, उपनयन संस्कार, भूमिपूजन, नए भवन का निर्माण, प्रतिष्ठा समारोह तथा अन्य बड़े शुभ आयोजनों को भी सामान्य रूप से टाल दिया जाता है। कई परिवार इस अवधि में नई संपत्ति या बहुमूल्य वस्तुओं की खरीदारी भी देवउठनी एकादशी के बाद करना उचित मानते हैं।
पूजा-पाठ, जप और दान का बढ़ जाता है महत्व
चातुर्मास को धार्मिक दृष्टि से पुण्य अर्जित करने का श्रेष्ठ समय माना गया है। मान्यता है कि इस अवधि में भगवान की भक्ति, मंत्र जाप, व्रत, दान, भागवत कथा श्रवण और सत्संग का विशेष फल प्राप्त होता है। देशभर के मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर भजन-कीर्तन, कथा, यज्ञ और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी इसी दौरान अधिक देखने को मिलता है।
साधु-संत एक स्थान पर रहकर करते हैं तप और प्रवचन
चातुर्मास के दौरान साधु-संत अपनी यात्राएं रोककर एक ही स्थान पर निवास करते हैं। इस अवधि में वे स्वाध्याय, तप, ध्यान, प्रवचन और धर्म प्रचार में समय व्यतीत करते हैं। श्रद्धालु भी उनके सत्संग में शामिल होकर आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करते हैं और संयमित जीवन अपनाने का संकल्प लेते हैं।
आत्मचिंतन और संयम का संदेश देता है चातुर्मास
धार्मिक ग्रंथों में चातुर्मास को आत्मशुद्धि, संयम, सेवा और आध्यात्मिक उन्नति का काल बताया गया है। यह समय व्यक्ति को भौतिक इच्छाओं से ऊपर उठकर आत्मचिंतन, सदाचार और ईश्वर भक्ति की ओर प्रेरित करता है। यही कारण है कि लाखों श्रद्धालु इन चार महीनों में नियमित पूजा, व्रत और सेवा कार्यों को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाते हैं।
20 नवंबर से फिर शुरू होंगे शुभ मुहूर्त
वर्ष 2026 में 20 नवंबर को पड़ने वाली देवउठनी एकादशी के साथ चातुर्मास समाप्त होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इसके बाद विवाह, गृह प्रवेश, उपनयन, मुंडन, भूमिपूजन और अन्य सभी मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त दोबारा प्रारंभ हो जाएंगे।